हाइड्रोफ़ीनाए (समुद्री सर्प)
Hydrophiinae (sea snakes)
समुद्री सर्प
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: जंतु
संघ: रज्जुकी (Chordata)
वर्ग: सरीसृप (Reptilia)
सुपरऑर्डर: लेपिडोसोरिया (Lepidosauria)
गण: स्क्वमाटा (Squamata)
उपगण: सर्प (Serpentes)
कुल: इलापिडाए (Elapidae)
उपकुल: हाइड्रोफ़ीनाए (Hydrophiinae)
स्मिथ, १९२६
हाइड्रोफ़ीनाए (Hydrophiinae), जिन्हें समुद्री सर्प (sea snakes) भी कहते हैं, इलापिडाए सर्प कुल की एक उपशाखा है जिसके सदस्य विषैले और अपना अधिकांश जीवन समुद्र व अन्य जलीय स्थानों पर व्यतीत करने वाले होते हैं। इन में से ज़्यादातर का शरीर समुद्री जीवन के अनुकूल होता है और वे धरती पर अधिक समय नहीं रह पाते हालांकि लातिकाउडा (Laticauda) वंश के सर्प कुछ हद तक धरती पर चलने में सक्षम हैं। इनकी पूँछ का अंतिम भाग चपटा होता है, जो उन्हें तैरने में सहायक होता है। समुद्री सर्प हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर के गरम जलीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। आनुवंशिकी (जेनेटिक) दृष्टि से समुद्री साँप औस्ट्रेलिया के विषैले सर्पों से सम्बन्धित हैं।[1]
विष
समुद्री सर्पों का ज़हर बहुत ही ख़तरनाक होता है, और कुछ का विष नाग के विष से १००० गुना अधिक पाया गया है। फिर भी समुद्री सर्पों के काटने से बहुत ही कम लोगों की जाने जाती हैं।[2] इसका पहला कारण है कि अधिकतर समुद्री सर्प शर्मीले स्वभाव के होते हैं। अगर उनका मनुष्य से सामना हो तो वे लगभग हमेशा ही भागने की चेष्टा करते हैं। यदी वे ग़लती से पकड़ में भी आ जाये तो भी छोड़े जाने पर उनकी कोशिश अक्सर भाग निकलने की ही होती है। दूसरा कारण है कि उनका मुँह अधिकतर बहुत छोटा होता है। यह मछलियों को काटने के लिये तो पर्याप्त है लेकिन मानवों को काटना उनके लिये कठिन होता है। अक्सर अगर वे काट भी लें तो विष का प्रवाह नहीं करते। फिर भी उनके विष के कारण वैज्ञानिक यह सलाह देते हैं कि समुद्री सर्पों के साथ बहुत ही सावधानी बर्ती जाये।[3] कुछ समुद्री सर्प ऐसे भी हैं जो क्रोधित होकर डसने की कोशिश करें।
श्वास

सभी सरीसृपों (रेप्टाइलों) की तरह समुद्री सर्पों के भी फेफड़े होते हैं और उन्हें साँस लेने के लिये समुद्र की सतह पर आना पड़ता है। लेकिन उनके फेफड़े उनके शरीरों के हिसाब से बहुत बड़े होते हैं और वे एक से दो घंटों के लिये साँस रोक सकते हैं। कुछ तो साँस भरकर समुद्र के फ़र्श पर जाकर सो भी जाते हैं। कई समुद्री सर्पों में कुछ हद तक अपनी त्वचा से पानी में घुले हुए आक्सीजन को खीचने की क्षमता होती है जो उन्हें अधिक देर तक श्वास रोकने देती है
Hydrophiinae (sea snakes)
समुद्री सर्प
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: जंतु
संघ: रज्जुकी (Chordata)
वर्ग: सरीसृप (Reptilia)
सुपरऑर्डर: लेपिडोसोरिया (Lepidosauria)
गण: स्क्वमाटा (Squamata)
उपगण: सर्प (Serpentes)
कुल: इलापिडाए (Elapidae)
उपकुल: हाइड्रोफ़ीनाए (Hydrophiinae)
स्मिथ, १९२६
हाइड्रोफ़ीनाए (Hydrophiinae), जिन्हें समुद्री सर्प (sea snakes) भी कहते हैं, इलापिडाए सर्प कुल की एक उपशाखा है जिसके सदस्य विषैले और अपना अधिकांश जीवन समुद्र व अन्य जलीय स्थानों पर व्यतीत करने वाले होते हैं। इन में से ज़्यादातर का शरीर समुद्री जीवन के अनुकूल होता है और वे धरती पर अधिक समय नहीं रह पाते हालांकि लातिकाउडा (Laticauda) वंश के सर्प कुछ हद तक धरती पर चलने में सक्षम हैं। इनकी पूँछ का अंतिम भाग चपटा होता है, जो उन्हें तैरने में सहायक होता है। समुद्री सर्प हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर के गरम जलीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। आनुवंशिकी (जेनेटिक) दृष्टि से समुद्री साँप औस्ट्रेलिया के विषैले सर्पों से सम्बन्धित हैं।[1]
विष
समुद्री सर्पों का ज़हर बहुत ही ख़तरनाक होता है, और कुछ का विष नाग के विष से १००० गुना अधिक पाया गया है। फिर भी समुद्री सर्पों के काटने से बहुत ही कम लोगों की जाने जाती हैं।[2] इसका पहला कारण है कि अधिकतर समुद्री सर्प शर्मीले स्वभाव के होते हैं। अगर उनका मनुष्य से सामना हो तो वे लगभग हमेशा ही भागने की चेष्टा करते हैं। यदी वे ग़लती से पकड़ में भी आ जाये तो भी छोड़े जाने पर उनकी कोशिश अक्सर भाग निकलने की ही होती है। दूसरा कारण है कि उनका मुँह अधिकतर बहुत छोटा होता है। यह मछलियों को काटने के लिये तो पर्याप्त है लेकिन मानवों को काटना उनके लिये कठिन होता है। अक्सर अगर वे काट भी लें तो विष का प्रवाह नहीं करते। फिर भी उनके विष के कारण वैज्ञानिक यह सलाह देते हैं कि समुद्री सर्पों के साथ बहुत ही सावधानी बर्ती जाये।[3] कुछ समुद्री सर्प ऐसे भी हैं जो क्रोधित होकर डसने की कोशिश करें।
श्वास

सभी सरीसृपों (रेप्टाइलों) की तरह समुद्री सर्पों के भी फेफड़े होते हैं और उन्हें साँस लेने के लिये समुद्र की सतह पर आना पड़ता है। लेकिन उनके फेफड़े उनके शरीरों के हिसाब से बहुत बड़े होते हैं और वे एक से दो घंटों के लिये साँस रोक सकते हैं। कुछ तो साँस भरकर समुद्र के फ़र्श पर जाकर सो भी जाते हैं। कई समुद्री सर्पों में कुछ हद तक अपनी त्वचा से पानी में घुले हुए आक्सीजन को खीचने की क्षमता होती है जो उन्हें अधिक देर तक श्वास रोकने देती है











